Sunday, July 27, 2008

रात की इबारत मिट ही जाती है

रात की इबारत मिट ही जाती है
वक्त के आगे किसकी चल पाती है

कील की तरह मुझमे समाती हैं
यादें धीरे धीरे दर्द पहुचती हैं

किस मुखोटे मे किसका चेहरा है खुदा जाने
जिंदगी लोग पहचानने मे निकल जाती है

हर तरफ़ इतना हसीं माहौल है
कभी कभी हमारी जिंदगी हमें तरसती है

भासा की खामियां तो सब जानते हैं
पर दिल की जुबान कहाँ दूजो तक पहुच पाती है

हर पल कुछ नया लेकर आता है
हर पल अहक या मुश्कान बिखर जाती है

मेरे शहर मे अभी भी रहता है वो
जिसके कारण गज़ल गज़ल कहलाती है

अम्मा अक्सर मुझको कहती रहती थी
तू अभी छोटा है तुझको समझ नही आती है

मानस भारद्वाज

10 comments:

!!अक्षय-मन!! said...

kya likha hai bhai ek dam jabardast......
maja aa gaya padkar....

ritu said...

very nice ....keep it up.

रश्मि प्रभा... said...

किस मुखोटे मे किसका चेहरा है खुदा जाने
जिंदगी लोग पहचानने मे निकल जाती है...........
बहुत सटीक पंक्तियाँ हैं और पूरी ग़ज़ल तो
अपने आप में काफी अर्थपूर्ण है,बहुत बेहतरीन ग़ज़ल

हकीम जी said...

बाप रे बाप ..इतनी सुन्दर इतनी कोमल..सच..क्य कहू अब...............

Girish Kumar Billore said...
This comment has been removed by the author.
Girish Kumar Billore said...

इस कविता के लिए बधाइयां
आप भी अन्य ब्लाग्स पर घूम लिया करिए उन पर टिप्पणी करना भी
आपसी प्रोत्साहन का तरीका है इस से संपर्क और एक रिश्ता बनता है
ब्लॉगर के लिए सबसे अधिक संतुष्टि टिप्पणियों से ही होता है....!

डाॅ रामजी गिरि said...

अच्छा लिखा है, पर वर्तनी कहीं-कहीं अशुद्ध है..

Unknown said...

aap toh kahi jaate nahi ho ..hamase hee puchhte rahte ho..thik hai

vijay kumar sappatti said...

ye sahi hai bhai , this is your best , i moved by words, maza aa gaya... last lines are the punch lines .. ustaad ho yaar...
good . write more .....
regards
vijay

Anonymous said...

कील की तरह मुझमे समाती हैं
यादें धीरे धीरे दर्द पहुचती हैं

किस मुखोटे मे किसका चेहरा है खुदा जाने
जिंदगी लोग पहचानने मे निकल जाती है

Ye lines are the best , man ko choo gayi hai .manas

keep it up .........[deepika][deepa]