मैं आ गया हूँ बता तेरा पैगाम क्या है
मैं मरने को तैयार हूँ बता इंतजाम क्या है
कोई भी अदालत इसे ग़लत नही कह सकती है
मैंने तो मोहब्बत की है बता तेरा इल्जाम क्या है
सोना चांदी हीरे मोती जो चाहा था सब मिल गया है
पर मुझसे खो गई है जो चीज उसका नाम क्या है
मैंने उससे मोहब्बत की है सीना ठोक के कहता हूँ
फांसी पे लटका दो इससे ज्यादा तुम्हारे बस मे अंजाम क्या है
वोह मेरा है मैं इसी ग़लतफ़हमी मे जी रहा हूँ
जो इस ग़लतफहमी को मिटा सके उसका नाम क्या है
मैं जबसे उससे मिला हूँ तन्हा हूँ पर उसके साथ हूँ
उसके आगे ये फूल तितली सागर शबनम चाँद क्या है
लोग कहते हैं मैं उसे भूल जाऊंगा एक दिन
दिन मान लिया पर रात भी आती है रात का इंतजाम क्या है
मानस भारद्वाज
Thursday, June 19, 2008
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8 comments:
maan gaye,bahut dum hai.......
sarahna ke shabd dhoondh rahi hun.
bahut umdaa
"कोई भी अदालत इसे ग़लत नही कह सकती है
मैंने तो मोहब्बत की है बता तेरा इल्जाम क्या है "
प्यार किया है मैंने ,गुनाह नहीं .. ये भावः अच्छा है .
very nice ghazal dear
वोह मेरा है मैं इसी ग़लतफ़हमी मे जी रहा हूँ
जो इस ग़लतफहमी को मिटा सके उसका नाम क्या है
Bahut khoob ! Bahut hi sunder abhivyakti hai !
Deepak Gogia
गुलज़ार साहब की ये नज़्म काफी है
बतौर टिपण्णी
तुम्हारे हाथों को चूम कर
छू के अपनी आँखों से आज मैं ने
जो आयतें पड़ नहीं सका
उन के लम्स महसूस कर लिये हैं
मैं मरने को तैयार हूँ बता इंतजाम क्या है
मज़ा आ गया मानस...एक एक लाइन में दम है.. बहुत खूब...
first half is better...akhiri ke kuchh sher mein pakad utni mazboot nahi hai...the thoughts are as good,but the expressions do not match with the high standards u usually set....
rachna bahut achhi hai par ek second thought ki zaroorat lagti hai
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