Wednesday, October 22, 2008

तुमसे मोहब्बत है इसलिए अभी ऐतबार बाकी है

तुमसे मोहब्बत है इसलिए ऐतबार बाकी है
इतने धोकों के बाद भी कारोबार बाकी है

मैंने तेरी चाहत में जिंदगी बरबाद कर ली
पर टूटा नही हूँ अभी घरबार बाकी है

मैंने हर आंसू हजारों में बेचा है
बेचना आए तो अभी खरीदार बाकी है

दोस्त तो सारे बदल गए हैं
दुश्मनों में अभी भी मेरा यार बाकी है


मानस भारद्वाज

7 comments:

shahroz said...

जिस ढंग से आप अपनी बात कह रहे हैं, ये काफी आश्वस्त करता है.
अच्छा लिख रहे हो भाई, धीरे-धीरे बाकी कमियाँ खुद-बखुद दुरुस्त होती जाएँगी.
कई शे'र हैं जो पाठक के ज़हन में क़ैद हो जाते हैं.

manvinder bhimber said...

bahut sunder dang se apni baat kah di hai

रश्मि प्रभा said...

bahut hi asardaar hai.......

अल्पना वर्मा said...

Wah WAh!
'maine becha hai aansu hazaron mein!.......'
bahut hi khubsurat sher hai--

likhtey raheeye

shama said...

"Dushmanonme abhi bhi mera yaar baaqi hai"!Aur ise dohranke alawa mere paas alfaaz nahi..pehli baar aayi hun aapke blogpe...mere blogpe kuchh samayik likha hai, padhneke liye amantrit kar rahi hun !

Meet's world of poetries said...

maine har aansu hazaro me becha hai
bechna aaye to abhi b kharidaar baaki hai

lovely lines Manas

ANKITRAJ said...

I AM SPEECHLESS................