Saturday, August 21, 2010

कभी भी ना समझ पाएगी

मुझपे हो के कायल कभी भी ना समझ पाएगी
मेरी बातों को वो जाहिल कभी भी ना समझ पाएगी

गिरेगी ओंस जब सुर्ख सुनहरी रातों में चंदा से
तब क्यों बजती है पायल कभी भी ना समझ पाएगी

बरसती आँखों को मौसम का बदलना मान लेगी
क्यों टपकती है छागल कभी भी ना समझ पाएगी

लकीरों को हाथों में अपने टक टक देखा करेगी
कब पीले होते हैं चावल कभी भी ना समझ पाएगी

बच्ची थी वो , बच्ची है , बच्ची ही रहेगी
क्यों शर्माती है पागल कभी भी ना समझ पाएगी

बहन मेरी उसमे , माँ मेरी , मेरी बेटी भी रहती है
आईने में अपना हासिल कभी भी ना समझ पाएगी

मानस भारद्वाज

Monday, August 16, 2010

कम से कम गाली तो दे पाता तुम्हे

काश मैं इतना नहीं चाहता तुम्हे
कम से कम गाली तो दे पाता तुम्हे

मैं तुम्हे फ़ोन लगाता रहता हूँ
तुम काटती रहती हो
मैं तुम्हे sms करता हूँ
तुम जवाब नहीं देती हो
मैं तुम्हारी चिंता करता हूँ
मैं रोता रहता हूँ
मैं बिस्तर पर जाता हूँ
मैं सो नहीं पाता हूँ
मैं चिढ़ता रहता हूँ
मैं खीजता रहता हूँ
मैं खुद पर चिल्लाता हूँ
दीवारों पर हाथ मारता हूँ
किताबें फेंक देता हूँ

मुझे बहुत गुस्सा आता है
खुद पर निकालता रहता हूँ
मैं खुद से सवाल करता हूँ
खुद से जीतता रहता हूँ
मैं खुद से हारता रहता हूँ
मैं कितनी भी कोशिश कर लूं
मैं तुम्हे बददुआये दे नहीं पाता
तुम्हारे लिए मन से
दुआएं झरती रहती हैं
मैं खुद को गाली देता हूँ
मैं तुम्हे गाली तक दे नहीं पाता

फिर मेरा फ़ोन vibrate होता है
तुम्हारा sms आता है
"मम्मी के साथ हूँ उल्लू "
मैं reply करता हूँ
कमीनी .........हरामी
पहले नहीं बोल सकती थी

तुम्हारा सिर्फ एक sms जादू करता है
मैं तुम्हे गाली देता हूँ
मैं तुम्हे गालियाँ देने लगता हूँ

मानस भारद्वाज

Thursday, August 12, 2010

चलो चलो जल्दी करो जश्न मनाओ

चलो चलो जल्दी करो
जश्न मनाओ
१५ अगस्त है
आज़ादी का बिगुल बजाओ

मोबाइल कम्पनियाँ नयी caller tune बनाओ
टीवी वालों एक विज्ञापन कई बार दिखाओ
समाचार पत्रों तुम भी
कुछ सनसनी लाओ ....ज्यादा लाओ
दोपहर को मनोज कुमार की पिक्चर देखो
शाम को कोई नयी वाली , T.R.P वाली देखो
चौराहों पर बच्चों
तिरंगा बेचो , रात की रोटी जुगाडो
खाना खाओ ...बाप को दारु पिलाओ
चलो चलो ....आज़ादी का जश्न मनाओ ..

मेरे देश की धरती सोना उगले
मदर इंडिया को जिंदा करो
सुबह रेडियो पर गाने सुनो
सफ़ेद कपडे पहनो
तिरंगे को सलामी दो
शाम को उतार लो
चलो चलो जल्दी करो

प्रधानमंत्री का भाषण सुनो
उम्मीद मन में जगाओ
उम्मीदों का हवन करो
अपनी आग खुद बुझाओ
चलो चलो जश्न मनाओ

देखो सबको sms करो
एक नही दो चार एक साथ कर दो
देशभक्ति में कोई कमी नहीं होने पाए
भले ही दो चार रूपया ज्यादा ठुक जाए

चलो चलो जल्दी करो
जश्न मनाओ
१५ अगस्त है
आज़ादी का बिगुल बजाओ

मानस भारद्वाज

Tuesday, August 10, 2010

इस दुनिया से कुछ कच्ची लड़की

इस दुनिया से कुछ कच्ची लड़की
मेरे हर झूठ के बीच सच्ची लड़की
मेरी थोपी हुई मोहब्बत सहने वाली
खामोश रहने वाली अच्छी लड़की

वो ख़्वाबों सी दिखने वाली
वो आँखों पर बिछने वाली
मेरी यादों के परदे पर टंगी
बचपन से बड़ी होती बच्ची , लड़की

वो रेशम के धागे सी
वो आधी रात में जागे सी
वो चाँद पर बैठी हुई
चश्मा लगा के कहती हुई
आईने में खुद को देखती है
बाल पीछे कर के कहती है
मैं भी अच्छी दिखती हूँ तुम्हे ??
मानस तुमको चढ़ गयी है

इस दुनिया से कुछ कच्ची लड़की
मेरे हर झूठ के बीच सच्ची लड़की

मानस भारद्वाज

Thursday, July 22, 2010

मैं ये सोचता हूँ

मैं ये सोचता हूँ की कुछ लिखूँ
क्या लिखूँ ये समझ नहीं आता है
जो समझ आता है वो लिख नहीं पाता
जो लिख पाता हूँ वो समझ नहीं आता है

जो आता है वो चाँद की रातें नहीं होती
जो होती है वो समय से मेरी बातें नहीं होती
जो होती हैं वो ज़िन्दगी की कसावटऐं हैं
तेरे संग बितायी हुई मुलाकातें नहीं होती

तेरे साथ का एक एहसास जो होता है
मैं सोचता हूँ कि वो लिखूँ
तेरे एहसास को मैं कैसे लिखूँ
जो मैं लिखता हूँ वो तेरी यादें हैं
वो यादें जो याद नहीं होती

मैं ये भी लिखता हूँ कि
मुझे तुझसे मोहब्बत रही है
अगली पंक्ति में फिर ये भी लिखता हूँ
मुझे तुझसे मोहब्बत नहीं है

मैं जो सोचता हूँ वो मैं लिख भी नहीं पाता
मैं सोचता हूँ तुझे किसी खुश्बू का नाम दूँ
मैं ये भी सोचता हूँ फिर कभी कभी
तेरे नाम पर ही सारी खुश्बूओं को नाम दूँ

सोचता हूँ कि तू चाँद की रातों की तरह है
फिर ये सोचता हूँ कि चाँद की रातें तेरी तरह है
मैं ये सोचता हूँ कि तू इसकी तरह है उसकी तरह है
फिर ये सोचता हूँ कि हर शख्श तेरी तरह है

मैं जिस बिस्तर पर अकेले रहता हूँ
सोचता हूँ तू मेरे बिस्तर पे मेरे साथ वहां है
मैं जो सोचता हूँ वो मैं कैसे बताऊ
मैं ये भी सोचता हूँ कि तू मेरे बच्चों की माँ है

मानस भारद्वाज

Sunday, February 7, 2010

कितने ही कांटे....

कितने ही कांटे राहों मे बो गए हैं
हम उसको खोजते खोजते खो गए हैं
उसका हमे छोड़ना भी क्या छोड़ना था
हम अपने होते-होते उसके हो गए हैं

मानस भारद्वाज

Friday, August 28, 2009

मेरी तमन्नाओ की टूटी हुई मिसाल है

मेरी तमन्नाओ की टूटी हुई मिसाल है
जिंदगी मेरा बिछाया हुआ जाल है

मैं खुद की फोटोकॉपी होकर रह गया हूँ
किसी और के शरीर पर मेरी खाल है

मानस

Tuesday, May 26, 2009

एक एक घडी कैसे कटती है.......

एक एक घडी कैसे कटती है जानता हूँ
तेरे लिए अब भी सिसकता हूँ दुआ मांगता हूँ
मुझे रौशनी और अंधेरों मे फर्क नहीं मालूम
अब मैं चौखट पर बिना जले दीये टांगता हूँ

तेरी यादों से अब काम नहीं बनता
हर एक मे तेरा ही अक्स छानता हूँ
मुझे मालूम है कोई तेरे जैसा नहीं है
मुझे मालूम है पर नहीं मानता हूँ

मुझे मालूम है दुनिया बदल जानी है
मैं हर किसी का चेहरा जानता हूँ
मुझे हर खेल की हकीकत मालूम है
मुझे मालूम है पर नहीं मानता हूँ

मानस भारद्वाज

Friday, May 1, 2009

ज़माने का ये सवाल मंहगा है

ज़माने का ये सवाल मंहगा है
तुमसे इश्क का मलाल मंहगा है

हमने मजबूरी मे चाँद बेचा है
तुम्हे भुलाने का ख्याल मंहगा है

मानस भारद्वाज

Thursday, April 16, 2009

रात की खामोसी जब दिल की बेकारी हो जाए
दोस्त ही अपने दुश्मनों से भारी हो जायें
तब लगता है हम भी सरकारी हो जायें
दुनिया का रंग पहचान ले कारोबारी हो जायें

वोह मेरा दर्द समझ नही सकता
और तो सारे नुस्खे आजमा लिए
अब उसे छोड़ने की तयारी हो जाए


मानस भारद्वाज

Tuesday, April 14, 2009

दुनिया का रूप बदल लेते हैं

दुनिया का रूप बदल लेते हैं
ख़ुद का स्वरुप बदल लेते हैं
मुझे तुमसे मोहब्बत है
यही आखिरी सच है
वरना लोग तो घरों मे
आईने लगा लेते हैं
सूरज की धूप बदल लेते हैं

कुछ लोग जिंदगी मे जंगली घास उगने देते हैं
और कुछ लॉन की दूब बदल लेते हैं
कुछ रिश्तो की आजमाइश मे लगे रहते हैं
और कुछ घरों के संदूक बदल लेते हैं

दुनिया का रूप बदल लेते हैं

मानस भारद्वाज

Tuesday, March 31, 2009

कुछ उदास से

कुछ उदास से नज़र आते हो तुम
मेरी खामोशियों पे छा जाते हो तुम
बहुत खामोशी है तुम्हारी आँखों मे
आवाज क्या आँसूओ मे बहाते हो तुम

मानस भारद्वाज

Tuesday, March 24, 2009

चाँद भरी दुपहरी मे कई बार निकलता है

चाँद भरी दुपहरी मे कई बार निकलता है
एक लड़की उसको देख आँखें मलती है
सूरज उसको टूक टूक देखा करता है
ऐसे ही तो सारी दुनिया चलती है

उसके न होने से कुछ नहीं बिगड़ता है
पर कुछ बात है जो मुझको खलती है
ये बात सच है सबको कड़वी लगती है
जाने क्यों रातो मे एक बस्ती जलती है

कौन ध्यान देगा बड़ी बेनाम सी बातें हैं
कहने को तो सारी बातें आम सी बातें हैं
सुना है एक शख्श बिलकुल मेरे जैसा है
अभी भी एक लड़की एक लड़के पर मरती है

मानस भारद्वाज

Wednesday, February 18, 2009

तेरे लिए बड़े बेताब हो रहे हैं
आजकल हम ही आफताब हो रहे हैं

हमने ही चाँद को चलना सिखाया था
हमारे कारन समन्दरों मे सैलाब हो रहे हैं

तू मेरा हाथ पकड़ के चल रही हैं
आजकल आंखों मे बड़े ख्वाब हो रहे हैं

मुझे धीरे धीरे मारने वालों ध्यान रखना
मेरे लहू के कतरे तेजाब हो रहे हैं

मानस भारद्वाज

Saturday, January 31, 2009

तू जेहर के प्याले मे अमृत भर दे

तू जेहेर के प्याले मे अमृत भर दे
तू एक बार मुझे छू ले अमर कर दे

मैं अपने लिए कुछ ज्यादा नही चाहता
दो पल सुख से जी लूँ ऐसा घर भर दे

मैं तमाम उम्र उजालों मे रहूँगा
मैं जितना रोया उतनी रौशनी कर दे

मैं अब मोहब्बत की बातें भी नही करता हूँ
कोई मेरा ये दर्द समझे इसे कम कर दे

मानस भारद्वाज

Saturday, December 20, 2008

कभी कभी ......

कभी कभी तुमसे बिछड़ने का भी गम नहीं होता
मोहब्बत का दुनिया मे कोई भी मरहम नहीं होता
मैं रात भर रोता हूँ पर आँखें नम नहीं होती
मेरे रोने से कभी कोई दरिया कम नहीं होता

मानस भारद्वाज

Sunday, December 7, 2008

हर्फ़ हर्फ़ सवाली हो जाता है

हर्फ़ हर्फ़ सवाली हो जाता है
तेरे बिना जीना गाली हो जाता है
मैं तुझे फ़ोन करता हूँ तू काट देता है
आदमी मुहब्बत मे भिखारी हो जाता है

मुझे तेरे प्यार पे ऐतबार है
पर तेरा रूखापन सवाली हो जाता है
तू जिसे ठुकरा दे वो
अच्छा खासा आदमी सरकारी हो जाता है

तुझे याद करना दर्द कहलाता है
तुझे लिख देना शायरी हो जाता है
तेरे साथ हर लम्हे मे जिंदगी बसती है
तेरे बाद हर लम्हा बेकरारी हो जाता है

सब तेरा ही नाम जपते हैं
तेरी आवाज सुन फ़कीर व्यापारी हो जाता है
सारी दुनिया मे तेरा राज चलता है
हर कोई तेरे सामने दरबारी हो जाता है

तुझसे मोहब्बत बीमारी है
आदमी बिन पैसे का दिहाडी हो जाता है
तू इश्क को खेल समझता है
तेरा चाहने वाला जुआरी हो जाता है

मानस भारद्वाज

Wednesday, October 22, 2008

तुमसे मोहब्बत है इसलिए अभी ऐतबार बाकी है

तुमसे मोहब्बत है इसलिए ऐतबार बाकी है
इतने धोकों के बाद भी कारोबार बाकी है

मैंने तेरी चाहत में जिंदगी बरबाद कर ली
पर टूटा नही हूँ अभी घरबार बाकी है

मैंने हर आंसू हजारों में बेचा है
बेचना आए तो अभी खरीदार बाकी है

दोस्त तो सारे बदल गए हैं
दुश्मनों में अभी भी मेरा यार बाकी है


मानस भारद्वाज

Monday, September 22, 2008

दर्द मुस्कराया इस तरह

दर्द मुस्कराया इस तरह जिंदगी बट गयी खैरात मे
आधा वक़्त गुजरा तेरे साथ मे आधा तेरी याद मे

मैंने हर आंसू से एक मोती चुनकर सजा दिया
हर सुबह का समझोता हुआ हैं शाम से बात बात मे

मानस भारद्वाज

Monday, September 15, 2008

मुझको नहीं पता कविता क्या हैं

मुझको नहीं पता कविता क्या हैं
क्या सबध हैं क्या भाव हैं क्या मिश्रा हैं
कोई क्यों मेरा लिखा पढता हैं
कोई क्यों पढ़ते पढ़ते रो देता हैं
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं

मुझको नहीं पता मेरे आस पास क्या दुनिया हैं
मुझे तो अपने आप से फुर्सत नहीं हैं
तो फिर क्यों ये कश्मीर का मसला हैं
क्यों लोग मरे हैं क्यों बम फटा हैं

मुझे तो दो वक़्त की रोटी मिल गई हैं
कुछ सिगरेट भी जलाई हैं कुछ नशा भी किया हैं
तो फिर क्यों किसानो ने आत्महत्या करी हैं
क्यों कब्र मे से एक आदमी आके कहता हैं
सारे कर्ज मैं ही आकर चुका दूंगा
मेरे बच्चे को छोड़ देना वो अभी छोटा हैं

मेरी बेहेन ने कॉन्वेंट मे पढाही करी हैं
मक्दोनाल्ड मे पिज्जा भी खाया हैं
टाइट जींस भी पहनी हैं नया फैशन भी अपनाया हैं
तो फिर क्यों गाँव मे एक बच्ची कहती हैं
अम्मा मरी नहीं थी उसे जिन्दा ही जलाया हैं

मेरा देश यू तो बहुत तरक्की कर रहा हैं
पर अभी भी स्कूल कम और मंदिर ज्यादा हैं
सेयर बाजार का मुझे नहीं पता हैं
अम्बानी टाटा बिरला ने क्या क्या किया हैं
धोनी यू तो बड़े बड़े मैच जिता रहा हैं
पर सुना हैं मेरे बाजु मे रहने वाला नत्थू
हर रोज जीने कि लिए कई बार मर रहा हैं

मुझको नहीं पता कविता क्या हैं

मानस भारद्वाज