Tuesday, May 26, 2009
एक एक घडी कैसे कटती है.......
तेरे लिए अब भी सिसकता हूँ दुआ मांगता हूँ
मुझे रौशनी और अंधेरों मे फर्क नहीं मालूम
अब मैं चौखट पर बिना जले दीये टांगता हूँ
तेरी यादों से अब काम नहीं बनता
हर एक मे तेरा ही अक्स छानता हूँ
मुझे मालूम है कोई तेरे जैसा नहीं है
मुझे मालूम है पर नहीं मानता हूँ
मुझे मालूम है दुनिया बदल जानी है
मैं हर किसी का चेहरा जानता हूँ
मुझे हर खेल की हकीकत मालूम है
मुझे मालूम है पर नहीं मानता हूँ
मानस भारद्वाज
Friday, May 1, 2009
ज़माने का ये सवाल मंहगा है
तुमसे इश्क का मलाल मंहगा है
हमने मजबूरी मे चाँद बेचा है
तुम्हे भुलाने का ख्याल मंहगा है
मानस भारद्वाज
Thursday, April 16, 2009
Tuesday, April 14, 2009
दुनिया का रूप बदल लेते हैं
ख़ुद का स्वरुप बदल लेते हैं
मुझे तुमसे मोहब्बत है
यही आखिरी सच है
वरना लोग तो घरों मे
आईने लगा लेते हैं
सूरज की धूप बदल लेते हैं
कुछ लोग जिंदगी मे जंगली घास उगने देते हैं
और कुछ लॉन की दूब बदल लेते हैं
कुछ रिश्तो की आजमाइश मे लगे रहते हैं
और कुछ घरों के संदूक बदल लेते हैं
दुनिया का रूप बदल लेते हैं
मानस भारद्वाज
Tuesday, March 31, 2009
कुछ उदास से
मेरी खामोशियों पे छा जाते हो तुम
बहुत खामोशी है तुम्हारी आँखों मे
आवाज क्या आँसूओ मे बहाते हो तुम
मानस भारद्वाज
Tuesday, March 24, 2009
चाँद भरी दुपहरी मे कई बार निकलता है
एक लड़की उसको देख आँखें मलती है
सूरज उसको टूक टूक देखा करता है
ऐसे ही तो सारी दुनिया चलती है
उसके न होने से कुछ नहीं बिगड़ता है
पर कुछ बात है जो मुझको खलती है
ये बात सच है सबको कड़वी लगती है
जाने क्यों रातो मे एक बस्ती जलती है
कौन ध्यान देगा बड़ी बेनाम सी बातें हैं
कहने को तो सारी बातें आम सी बातें हैं
सुना है एक शख्श बिलकुल मेरे जैसा है
अभी भी एक लड़की एक लड़के पर मरती है
मानस भारद्वाज
Wednesday, February 18, 2009
Saturday, January 31, 2009
तू जेहर के प्याले मे अमृत भर दे
तू एक बार मुझे छू ले अमर कर दे
मैं अपने लिए कुछ ज्यादा नही चाहता
दो पल सुख से जी लूँ ऐसा घर भर दे
मैं तमाम उम्र उजालों मे रहूँगा
मैं जितना रोया उतनी रौशनी कर दे
मैं अब मोहब्बत की बातें भी नही करता हूँ
कोई मेरा ये दर्द समझे इसे कम कर दे
मानस भारद्वाज
Saturday, December 20, 2008
कभी कभी ......
मोहब्बत का दुनिया मे कोई भी मरहम नहीं होता
मैं रात भर रोता हूँ पर आँखें नम नहीं होती
मेरे रोने से कभी कोई दरिया कम नहीं होता
मानस भारद्वाज
Sunday, December 7, 2008
हर्फ़ हर्फ़ सवाली हो जाता है
तेरे बिना जीना गाली हो जाता है
मैं तुझे फ़ोन करता हूँ तू काट देता है
आदमी मुहब्बत मे भिखारी हो जाता है
मुझे तेरे प्यार पे ऐतबार है
पर तेरा रूखापन सवाली हो जाता है
तू जिसे ठुकरा दे वो
अच्छा खासा आदमी सरकारी हो जाता है
तुझे याद करना दर्द कहलाता है
तुझे लिख देना शायरी हो जाता है
तेरे साथ हर लम्हे मे जिंदगी बसती है
तेरे बाद हर लम्हा बेकरारी हो जाता है
सब तेरा ही नाम जपते हैं
तेरी आवाज सुन फ़कीर व्यापारी हो जाता है
सारी दुनिया मे तेरा राज चलता है
हर कोई तेरे सामने दरबारी हो जाता है
तुझसे मोहब्बत बीमारी है
आदमी बिन पैसे का दिहाडी हो जाता है
तू इश्क को खेल समझता है
तेरा चाहने वाला जुआरी हो जाता है
मानस भारद्वाज
Wednesday, October 22, 2008
तुमसे मोहब्बत है इसलिए अभी ऐतबार बाकी है
इतने धोकों के बाद भी कारोबार बाकी है
मैंने तेरी चाहत में जिंदगी बरबाद कर ली
पर टूटा नही हूँ अभी घरबार बाकी है
मैंने हर आंसू हजारों में बेचा है
बेचना आए तो अभी खरीदार बाकी है
दोस्त तो सारे बदल गए हैं
दुश्मनों में अभी भी मेरा यार बाकी है
मानस भारद्वाज
Monday, September 22, 2008
दर्द मुस्कराया इस तरह
आधा वक़्त गुजरा तेरे साथ मे आधा तेरी याद मे
मैंने हर आंसू से एक मोती चुनकर सजा दिया
हर सुबह का समझोता हुआ हैं शाम से बात बात मे
मानस भारद्वाज
Monday, September 15, 2008
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं
क्या सबध हैं क्या भाव हैं क्या मिश्रा हैं
कोई क्यों मेरा लिखा पढता हैं
कोई क्यों पढ़ते पढ़ते रो देता हैं
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं
मुझको नहीं पता मेरे आस पास क्या दुनिया हैं
मुझे तो अपने आप से फुर्सत नहीं हैं
तो फिर क्यों ये कश्मीर का मसला हैं
क्यों लोग मरे हैं क्यों बम फटा हैं
मुझे तो दो वक़्त की रोटी मिल गई हैं
कुछ सिगरेट भी जलाई हैं कुछ नशा भी किया हैं
तो फिर क्यों किसानो ने आत्महत्या करी हैं
क्यों कब्र मे से एक आदमी आके कहता हैं
सारे कर्ज मैं ही आकर चुका दूंगा
मेरे बच्चे को छोड़ देना वो अभी छोटा हैं
मेरी बेहेन ने कॉन्वेंट मे पढाही करी हैं
मक्दोनाल्ड मे पिज्जा भी खाया हैं
टाइट जींस भी पहनी हैं नया फैशन भी अपनाया हैं
तो फिर क्यों गाँव मे एक बच्ची कहती हैं
अम्मा मरी नहीं थी उसे जिन्दा ही जलाया हैं
मेरा देश यू तो बहुत तरक्की कर रहा हैं
पर अभी भी स्कूल कम और मंदिर ज्यादा हैं
सेयर बाजार का मुझे नहीं पता हैं
अम्बानी टाटा बिरला ने क्या क्या किया हैं
धोनी यू तो बड़े बड़े मैच जिता रहा हैं
पर सुना हैं मेरे बाजु मे रहने वाला नत्थू
हर रोज जीने कि लिए कई बार मर रहा हैं
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं
मानस भारद्वाज
Thursday, September 11, 2008
तूने भी तो सुना हैं दरिया के पानी को
फूलों सी महकती मोहब्बत की कहानी को
कि लब्जों की जबानी सब सच नहीं होती
समंदर की लहरें किसी के बस नहीं होती
ये रातों मे बहता हुआ पैगाम भी सुन ले
आँखों से टपकता हुआ एक नाम भी सुन ले
बात सिर्फ इतनी हैं यहाँ तेरी बात नहीं होती
तू वक़्त के साथ हैं पर कभी साथ नहीं होती
मेरे बस मे सिर्फ इतना हैं तेरा नाम न लूं
सरेआम तेरे साथ रहूँ पर सरेआम न लूं
पर ये यादें भी सिर्फ याद नहीं रहती
साथ हंसती हैं रोटी हैं पर साथ नहीं रहती
चिड्ती हैं खीजती हैं चिडाती हैं यादें
पल दो पल साथ ले जाती हैं यादें
मेरी दुनिया भी कभी कभी मेरी दुनिया नहीं रहती
मैं इनके साथ रहता हूँ ये मेरे साथ नहीं रहती
मानस भारद्वाज
Saturday, August 2, 2008
जिन्दगी
न सोचा कभी न चाहा कभी
फ़िर भी न जाने क्यों
तुझसे मुलाकात हो गई
बात तो खेर तुझमे
कुछ ख़ास नही थी
फ़िर भी न जाने क्यों
ये बात हो गई
शब्द जुबान पर आकर लड़खडाने लगे
एहसास उमंग नई जगाने लगे
कुछ पलों मे जिन्दगी गुजरने लगी
कुछ पलों मे हम जिन्दगी संजोने सजाने लगे
पर जिंदगी का क्या है कैसे ये दगा देती है
कभी ये हँसा देती है तो कभी रूला देती है
कहते हैं जीने के लिए साँसे चाहिए
पर हमे मालूम है ये सबको कहाँ देती है
जिंदगी एक नाव है जो समंदर मे बहती ही रहती है
जिंदगी एक आग है जो जलती ही रहती है
न नाव का साहिल है न आग को है बुझना
बस तैरते ही रहना है और जलते ही रहना है
और अब मुझे कभी कभी लगता है
मैं यू ही इधर उधर भटकता रहता हूँ
पता नही क्या खोजा करता हूँ किसे ढूंढ़ता रहता हूँ
अब मुझे समझ मे आया है कि तू ही जिन्दगी है
मानस भारद्वाज
Sunday, July 27, 2008
रात की इबारत मिट ही जाती है
रात की इबारत मिट ही जाती है
वक्त के आगे किसकी चल पाती है
यादें धीरे धीरे दर्द पहुचती हैं
जिंदगी लोग पहचानने मे निकल जाती है
कभी कभी हमारी जिंदगी हमें तरसती है
पर दिल की जुबान कहाँ दूजो तक पहुच पाती है
हर पल अहक या मुश्कान बिखर जाती है
जिसके कारण गज़ल गज़ल कहलाती है
तू अभी छोटा है तुझको समझ नही आती है
मानस भारद्वाज
Wednesday, July 16, 2008
जितनी तमन्नाये थी सब पूरी हो गई थी
पर फिर भी दिल मे बैचैनी थी वो क्यों थी
जिस से मोहब्बत थी वो मिल गई थी
पर फिर भी किसी की याद थी वो क्यों थी
जितने दुःख थे आंसू मे बह गए थे
पर फिर भी आंखों मे नमी थी वो क्यों थी
मानस भारद्वाज
Monday, July 14, 2008
जिन्दगी हवाओं मे बहती है
लहरों मे मचलती है
ख्वाबों मे बेहेकती है
आसमा मे रंगों मे रहती है
जिन्दगी उमंगों की पोटली है
तरंगों का खजाना है
ख्वाइशों का चहकना है
यादों का दहकना है
जिन्दगी एक कविता पुरानी है
खोयी हुई एक कहानी है
यू तो पड़े हुए मिल जाती है
पर खोजो तो हाथ नही आनी है
जिन्दगी रागों का समंदर है
यू तो कुछ भी नही है
पर बहुत कुछ हर किसी के अंदर है
जिंदगी को लिखूं तो बहुत शब्द हैं
न लिखूं तो कुछ भी कहाँ है
मुझे नही पता
जिंदगी क्या है
शब्धों मे कहूं तो सिर्फ़ इतना है
वो जिन्दगी जिन्दगी नही है
जो जिन्दगी तेरे बिना है
मानस भारद्वाज
Saturday, July 12, 2008
raat khwab me
की उसने अपने हाथों से अपना फ़ोन नंबर
मेरे हाथों पर लिख दिया है
और अपने घर का पता बताया है
मुझे बुलाया भी है
जागता हूँ तो हाथों पर क्या देखता हूँ
हाथों पर नम्बर तो मिट चुका है
पर हथेली पर कलम चलने का निशान बाकी है
उसके घर का पता तो याद नही है
पर अभी भी यादों मे एक मकान बाकी है
मानस भारद्वाज
Wednesday, June 25, 2008
कुछ मिसरे अभी जिंदा हैं
तुझसे बचने के लिए तेरे इशारों पे फिर हूँ
मैं बुद्ध नही हूँ पर दुनिया छोड़ चुका हूँ
अपनी हस्ती मिटाकर ख़ुद से भी मुँह मोड़ चुका हूँ
जंगल नदियाँ पर्वत पानी बादल पंछी खुशियाँ वीरानी
सिर्फ़ तुझे ही नही छोडा इन सब को भी छोड़ चुका हूँ
मैं शब्द शब्द से नाता तोड़ भावों से मुँह मोड़ चुका हूँ
प्यार की ख्वाइश इतनी करी की प्यार की ख्वाइश छोड़ चुका हूँ
मुझे जेहर की आदत हैं जेहर पे जिन्दा रहता हूँ
न कंठ नीला हैं न साँप लिप्त हैं पर तीसरी आँख खोल चुका हूँ
मानस भारद्वाज