Thursday, April 16, 2009

रात की खामोसी जब दिल की बेकारी हो जाए
दोस्त ही अपने दुश्मनों से भारी हो जायें
तब लगता है हम भी सरकारी हो जायें
दुनिया का रंग पहचान ले कारोबारी हो जायें

वोह मेरा दर्द समझ नही सकता
और तो सारे नुस्खे आजमा लिए
अब उसे छोड़ने की तयारी हो जाए


मानस भारद्वाज

Tuesday, April 14, 2009

दुनिया का रूप बदल लेते हैं

दुनिया का रूप बदल लेते हैं
ख़ुद का स्वरुप बदल लेते हैं
मुझे तुमसे मोहब्बत है
यही आखिरी सच है
वरना लोग तो घरों मे
आईने लगा लेते हैं
सूरज की धूप बदल लेते हैं

कुछ लोग जिंदगी मे जंगली घास उगने देते हैं
और कुछ लॉन की दूब बदल लेते हैं
कुछ रिश्तो की आजमाइश मे लगे रहते हैं
और कुछ घरों के संदूक बदल लेते हैं

दुनिया का रूप बदल लेते हैं

मानस भारद्वाज

Tuesday, March 31, 2009

कुछ उदास से

कुछ उदास से नज़र आते हो तुम
मेरी खामोशियों पे छा जाते हो तुम
बहुत खामोशी है तुम्हारी आँखों मे
आवाज क्या आँसूओ मे बहाते हो तुम

मानस भारद्वाज

Tuesday, March 24, 2009

चाँद भरी दुपहरी मे कई बार निकलता है

चाँद भरी दुपहरी मे कई बार निकलता है
एक लड़की उसको देख आँखें मलती है
सूरज उसको टूक टूक देखा करता है
ऐसे ही तो सारी दुनिया चलती है

उसके न होने से कुछ नहीं बिगड़ता है
पर कुछ बात है जो मुझको खलती है
ये बात सच है सबको कड़वी लगती है
जाने क्यों रातो मे एक बस्ती जलती है

कौन ध्यान देगा बड़ी बेनाम सी बातें हैं
कहने को तो सारी बातें आम सी बातें हैं
सुना है एक शख्श बिलकुल मेरे जैसा है
अभी भी एक लड़की एक लड़के पर मरती है

मानस भारद्वाज

Wednesday, February 18, 2009

तेरे लिए बड़े बेताब हो रहे हैं
आजकल हम ही आफताब हो रहे हैं

हमने ही चाँद को चलना सिखाया था
हमारे कारन समन्दरों मे सैलाब हो रहे हैं

तू मेरा हाथ पकड़ के चल रही हैं
आजकल आंखों मे बड़े ख्वाब हो रहे हैं

मुझे धीरे धीरे मारने वालों ध्यान रखना
मेरे लहू के कतरे तेजाब हो रहे हैं

मानस भारद्वाज

Saturday, January 31, 2009

तू जेहर के प्याले मे अमृत भर दे

तू जेहेर के प्याले मे अमृत भर दे
तू एक बार मुझे छू ले अमर कर दे

मैं अपने लिए कुछ ज्यादा नही चाहता
दो पल सुख से जी लूँ ऐसा घर भर दे

मैं तमाम उम्र उजालों मे रहूँगा
मैं जितना रोया उतनी रौशनी कर दे

मैं अब मोहब्बत की बातें भी नही करता हूँ
कोई मेरा ये दर्द समझे इसे कम कर दे

मानस भारद्वाज

Saturday, December 20, 2008

कभी कभी ......

कभी कभी तुमसे बिछड़ने का भी गम नहीं होता
मोहब्बत का दुनिया मे कोई भी मरहम नहीं होता
मैं रात भर रोता हूँ पर आँखें नम नहीं होती
मेरे रोने से कभी कोई दरिया कम नहीं होता

मानस भारद्वाज

Sunday, December 7, 2008

हर्फ़ हर्फ़ सवाली हो जाता है

हर्फ़ हर्फ़ सवाली हो जाता है
तेरे बिना जीना गाली हो जाता है
मैं तुझे फ़ोन करता हूँ तू काट देता है
आदमी मुहब्बत मे भिखारी हो जाता है

मुझे तेरे प्यार पे ऐतबार है
पर तेरा रूखापन सवाली हो जाता है
तू जिसे ठुकरा दे वो
अच्छा खासा आदमी सरकारी हो जाता है

तुझे याद करना दर्द कहलाता है
तुझे लिख देना शायरी हो जाता है
तेरे साथ हर लम्हे मे जिंदगी बसती है
तेरे बाद हर लम्हा बेकरारी हो जाता है

सब तेरा ही नाम जपते हैं
तेरी आवाज सुन फ़कीर व्यापारी हो जाता है
सारी दुनिया मे तेरा राज चलता है
हर कोई तेरे सामने दरबारी हो जाता है

तुझसे मोहब्बत बीमारी है
आदमी बिन पैसे का दिहाडी हो जाता है
तू इश्क को खेल समझता है
तेरा चाहने वाला जुआरी हो जाता है

मानस भारद्वाज

Wednesday, October 22, 2008

तुमसे मोहब्बत है इसलिए अभी ऐतबार बाकी है

तुमसे मोहब्बत है इसलिए ऐतबार बाकी है
इतने धोकों के बाद भी कारोबार बाकी है

मैंने तेरी चाहत में जिंदगी बरबाद कर ली
पर टूटा नही हूँ अभी घरबार बाकी है

मैंने हर आंसू हजारों में बेचा है
बेचना आए तो अभी खरीदार बाकी है

दोस्त तो सारे बदल गए हैं
दुश्मनों में अभी भी मेरा यार बाकी है


मानस भारद्वाज

Monday, September 22, 2008

दर्द मुस्कराया इस तरह

दर्द मुस्कराया इस तरह जिंदगी बट गयी खैरात मे
आधा वक़्त गुजरा तेरे साथ मे आधा तेरी याद मे

मैंने हर आंसू से एक मोती चुनकर सजा दिया
हर सुबह का समझोता हुआ हैं शाम से बात बात मे

मानस भारद्वाज

Monday, September 15, 2008

मुझको नहीं पता कविता क्या हैं

मुझको नहीं पता कविता क्या हैं
क्या सबध हैं क्या भाव हैं क्या मिश्रा हैं
कोई क्यों मेरा लिखा पढता हैं
कोई क्यों पढ़ते पढ़ते रो देता हैं
मुझको नहीं पता कविता क्या हैं

मुझको नहीं पता मेरे आस पास क्या दुनिया हैं
मुझे तो अपने आप से फुर्सत नहीं हैं
तो फिर क्यों ये कश्मीर का मसला हैं
क्यों लोग मरे हैं क्यों बम फटा हैं

मुझे तो दो वक़्त की रोटी मिल गई हैं
कुछ सिगरेट भी जलाई हैं कुछ नशा भी किया हैं
तो फिर क्यों किसानो ने आत्महत्या करी हैं
क्यों कब्र मे से एक आदमी आके कहता हैं
सारे कर्ज मैं ही आकर चुका दूंगा
मेरे बच्चे को छोड़ देना वो अभी छोटा हैं

मेरी बेहेन ने कॉन्वेंट मे पढाही करी हैं
मक्दोनाल्ड मे पिज्जा भी खाया हैं
टाइट जींस भी पहनी हैं नया फैशन भी अपनाया हैं
तो फिर क्यों गाँव मे एक बच्ची कहती हैं
अम्मा मरी नहीं थी उसे जिन्दा ही जलाया हैं

मेरा देश यू तो बहुत तरक्की कर रहा हैं
पर अभी भी स्कूल कम और मंदिर ज्यादा हैं
सेयर बाजार का मुझे नहीं पता हैं
अम्बानी टाटा बिरला ने क्या क्या किया हैं
धोनी यू तो बड़े बड़े मैच जिता रहा हैं
पर सुना हैं मेरे बाजु मे रहने वाला नत्थू
हर रोज जीने कि लिए कई बार मर रहा हैं

मुझको नहीं पता कविता क्या हैं

मानस भारद्वाज

Thursday, September 11, 2008

तूने भी तो सुना हैं दरिया के पानी को

तूने भी तो सुना हैं दरिया के पानी को
फूलों सी महकती मोहब्बत की कहानी को
कि लब्जों की जबानी सब सच नहीं होती
समंदर की लहरें किसी के बस नहीं होती

ये रातों मे बहता हुआ पैगाम भी सुन ले
आँखों से टपकता हुआ एक नाम भी सुन ले
बात सिर्फ इतनी हैं यहाँ तेरी बात नहीं होती
तू वक़्त के साथ हैं पर कभी साथ नहीं होती

मेरे बस मे सिर्फ इतना हैं तेरा नाम न लूं
सरेआम तेरे साथ रहूँ पर सरेआम न लूं
पर ये यादें भी सिर्फ याद नहीं रहती
साथ हंसती हैं रोटी हैं पर साथ नहीं रहती

चिड्ती हैं खीजती हैं चिडाती हैं यादें
पल दो पल साथ ले जाती हैं यादें
मेरी दुनिया भी कभी कभी मेरी दुनिया नहीं रहती
मैं इनके साथ रहता हूँ ये मेरे साथ नहीं रहती

मानस भारद्वाज

Saturday, August 2, 2008

जिन्दगी

न सोचा कभी न चाहा कभी
फ़िर भी न जाने क्यों
तुझसे मुलाकात हो गई
बात तो खेर तुझमे
कुछ ख़ास नही थी
फ़िर भी न जाने क्यों
ये बात हो गई


शब्द जुबान पर आकर लड़खडाने लगे

एहसास उमंग नई जगाने लगे

कुछ पलों मे जिन्दगी गुजरने लगी
कुछ पलों मे हम जिन्दगी संजोने सजाने लगे

पर जिंदगी का क्या है कैसे ये दगा देती है
कभी ये हँसा देती है तो कभी रूला देती है
कहते हैं जीने के लिए साँसे चाहिए
पर हमे मालूम है ये सबको कहाँ देती है

जिंदगी एक नाव है जो समंदर मे बहती ही रहती है
जिंदगी एक आग है जो जलती ही रहती है
न नाव का साहिल है न आग को है बुझना
बस तैरते ही रहना है और जलते ही रहना है

और अब मुझे कभी कभी लगता है
मैं यू ही इधर उधर भटकता रहता हूँ
पता नही क्या खोजा करता हूँ किसे ढूंढ़ता रहता हूँ

अब मुझे समझ मे आया है कि तू ही जिन्दगी है

मानस भारद्वाज

Sunday, July 27, 2008

रात की इबारत मिट ही जाती है

रात की इबारत मिट ही जाती है
वक्त के आगे किसकी चल पाती है

कील की तरह मुझमे समाती हैं
यादें धीरे धीरे दर्द पहुचती हैं

किस मुखोटे मे किसका चेहरा है खुदा जाने
जिंदगी लोग पहचानने मे निकल जाती है

हर तरफ़ इतना हसीं माहौल है
कभी कभी हमारी जिंदगी हमें तरसती है

भासा की खामियां तो सब जानते हैं
पर दिल की जुबान कहाँ दूजो तक पहुच पाती है

हर पल कुछ नया लेकर आता है
हर पल अहक या मुश्कान बिखर जाती है

मेरे शहर मे अभी भी रहता है वो
जिसके कारण गज़ल गज़ल कहलाती है

अम्मा अक्सर मुझको कहती रहती थी
तू अभी छोटा है तुझको समझ नही आती है

मानस भारद्वाज

Wednesday, July 16, 2008

जितनी तमन्नाये थी सब पूरी हो गई थी

जितनी तमन्नाये थी सब पूरी हो गई थी
पर फिर भी दिल मे बैचैनी थी वो क्यों थी

जिस से मोहब्बत थी वो मिल गई थी
पर फिर भी किसी की याद थी वो क्यों थी

जितने दुःख थे आंसू मे बह गए थे
पर फिर भी आंखों मे नमी थी वो क्यों थी

मानस भारद्वाज

Monday, July 14, 2008

जिन्दगी हवाओं मे बहती है

जिन्दगी हवाओं मे बहती है
लहरों मे मचलती है
ख्वाबों मे बेहेकती है
आसमा मे रंगों मे रहती है

जिन्दगी उमंगों की पोटली है
तरंगों का खजाना है
ख्वाइशों का चहकना है
यादों का दहकना है

जिन्दगी एक कविता पुरानी है
खोयी हुई एक कहानी है
यू तो पड़े हुए मिल जाती है
पर खोजो तो हाथ नही आनी है

जिन्दगी रागों का समंदर है
यू तो कुछ भी नही है
पर बहुत कुछ हर किसी के अंदर है

जिंदगी को लिखूं तो बहुत शब्द हैं
न लिखूं तो कुछ भी कहाँ है
मुझे नही पता
जिंदगी क्या है
शब्धों मे कहूं तो सिर्फ़ इतना है

वो जिन्दगी जिन्दगी नही है
जो जिन्दगी तेरे बिना है


मानस भारद्वाज

Saturday, July 12, 2008

raat khwab me

रात ख्वाब मे क्या देखता हूँ
की उसने अपने हाथों से अपना फ़ोन नंबर
मेरे हाथों पर लिख दिया है
और अपने घर का पता बताया है
मुझे बुलाया भी है


जागता हूँ तो हाथों पर क्या देखता हूँ
हाथों पर नम्बर तो मिट चुका है
पर हथेली पर कलम चलने का निशान बाकी है
उसके घर का पता तो याद नही है
पर अभी भी यादों मे एक मकान बाकी है

मानस भारद्वाज

Wednesday, June 25, 2008

कुछ मिसरे अभी जिंदा हैं

मैं बंजारों की तरह दुनिया भर के किनारों पे फिर हूँ
तुझसे बचने के लिए तेरे इशारों पे फिर हूँ

मैं बुद्ध नही हूँ पर दुनिया छोड़ चुका हूँ
अपनी हस्ती मिटाकर ख़ुद से भी मुँह मोड़ चुका हूँ
जंगल नदियाँ पर्वत पानी बादल पंछी खुशियाँ वीरानी
सिर्फ़ तुझे ही नही छोडा इन सब को भी छोड़ चुका हूँ

मैं शब्द शब्द से नाता तोड़ भावों से मुँह मोड़ चुका हूँ
प्यार की ख्वाइश इतनी करी की प्यार की ख्वाइश छोड़ चुका हूँ
मुझे जेहर की आदत हैं जेहर पे जिन्दा रहता हूँ
न कंठ नीला हैं न साँप लिप्त हैं पर तीसरी आँख खोल चुका हूँ

मानस भारद्वाज

Thursday, June 19, 2008

मैं आ गया हूँ बता

मैं आ गया हूँ बता तेरा पैगाम क्या है
मैं मरने को तैयार हूँ बता इंतजाम क्या है

कोई भी अदालत इसे ग़लत नही कह सकती है
मैंने तो मोहब्बत की है बता तेरा इल्जाम क्या है

सोना चांदी हीरे मोती जो चाहा था सब मिल गया है
पर मुझसे खो गई है जो चीज उसका नाम क्या है

मैंने उससे मोहब्बत की है सीना ठोक के कहता हूँ
फांसी पे लटका दो इससे ज्यादा तुम्हारे बस मे अंजाम क्या है

वोह मेरा है मैं इसी ग़लतफ़हमी मे जी रहा हूँ
जो इस ग़लतफहमी को मिटा सके उसका नाम क्या है

मैं जबसे उससे मिला हूँ तन्हा हूँ पर उसके साथ हूँ
उसके आगे ये फूल तितली सागर शबनम चाँद क्या है

लोग कहते हैं मैं उसे भूल जाऊंगा एक दिन
दिन मान लिया पर रात भी आती है रात का इंतजाम क्या है

मानस भारद्वाज

Sunday, May 25, 2008

तुमको शब्दों मे ढाल सकू मैं इतनी मेरी औकाद नही है
आज मेरे पास सब हैं चाँद मेरे आस पास नही है

तेरे बिना खुशियाँ ही नही गम भी अधूरा है
ये कैसा दर्द है की आज तेरे बिना मन भी उदास नही है

मैं दरिया किनारे खडा हो जाता तो सागर मिलने आता था
आज साहिल पे आया हून्तो कोई लहर भी आसपास नही है

मैं बरसों इसी ग़लतफहमी मे जिया हूँ की तेरे लिए ही बना हूँ
अब मरकर तेरी सासों मे जिंदा हूँ मेरी लाश मेरी लाश नही है

मानस भारद्वाज