मैं बंजारों की तरह दुनिया भर के किनारों पे फिर हूँ
तुझसे बचने के लिए तेरे इशारों पे फिर हूँ
मैं बुद्ध नही हूँ पर दुनिया छोड़ चुका हूँ
अपनी हस्ती मिटाकर ख़ुद से भी मुँह मोड़ चुका हूँ
जंगल नदियाँ पर्वत पानी बादल पंछी खुशियाँ वीरानी
सिर्फ़ तुझे ही नही छोडा इन सब को भी छोड़ चुका हूँ
मैं शब्द शब्द से नाता तोड़ भावों से मुँह मोड़ चुका हूँ
प्यार की ख्वाइश इतनी करी की प्यार की ख्वाइश छोड़ चुका हूँ
मुझे जेहर की आदत हैं जेहर पे जिन्दा रहता हूँ
न कंठ नीला हैं न साँप लिप्त हैं पर तीसरी आँख खोल चुका हूँ
मानस भारद्वाज
Wednesday, June 25, 2008
Thursday, June 19, 2008
मैं आ गया हूँ बता
मैं आ गया हूँ बता तेरा पैगाम क्या है
मैं मरने को तैयार हूँ बता इंतजाम क्या है
कोई भी अदालत इसे ग़लत नही कह सकती है
मैंने तो मोहब्बत की है बता तेरा इल्जाम क्या है
सोना चांदी हीरे मोती जो चाहा था सब मिल गया है
पर मुझसे खो गई है जो चीज उसका नाम क्या है
मैंने उससे मोहब्बत की है सीना ठोक के कहता हूँ
फांसी पे लटका दो इससे ज्यादा तुम्हारे बस मे अंजाम क्या है
वोह मेरा है मैं इसी ग़लतफ़हमी मे जी रहा हूँ
जो इस ग़लतफहमी को मिटा सके उसका नाम क्या है
मैं जबसे उससे मिला हूँ तन्हा हूँ पर उसके साथ हूँ
उसके आगे ये फूल तितली सागर शबनम चाँद क्या है
लोग कहते हैं मैं उसे भूल जाऊंगा एक दिन
दिन मान लिया पर रात भी आती है रात का इंतजाम क्या है
मानस भारद्वाज
मैं मरने को तैयार हूँ बता इंतजाम क्या है
कोई भी अदालत इसे ग़लत नही कह सकती है
मैंने तो मोहब्बत की है बता तेरा इल्जाम क्या है
सोना चांदी हीरे मोती जो चाहा था सब मिल गया है
पर मुझसे खो गई है जो चीज उसका नाम क्या है
मैंने उससे मोहब्बत की है सीना ठोक के कहता हूँ
फांसी पे लटका दो इससे ज्यादा तुम्हारे बस मे अंजाम क्या है
वोह मेरा है मैं इसी ग़लतफ़हमी मे जी रहा हूँ
जो इस ग़लतफहमी को मिटा सके उसका नाम क्या है
मैं जबसे उससे मिला हूँ तन्हा हूँ पर उसके साथ हूँ
उसके आगे ये फूल तितली सागर शबनम चाँद क्या है
लोग कहते हैं मैं उसे भूल जाऊंगा एक दिन
दिन मान लिया पर रात भी आती है रात का इंतजाम क्या है
मानस भारद्वाज
Sunday, May 25, 2008
तुमको शब्दों मे ढाल सकू मैं इतनी मेरी औकाद नही है
आज मेरे पास सब हैं चाँद मेरे आस पास नही है
तेरे बिना खुशियाँ ही नही गम भी अधूरा है
ये कैसा दर्द है की आज तेरे बिना मन भी उदास नही है
मैं दरिया किनारे खडा हो जाता तो सागर मिलने आता था
आज साहिल पे आया हून्तो कोई लहर भी आसपास नही है
मैं बरसों इसी ग़लतफहमी मे जिया हूँ की तेरे लिए ही बना हूँ
अब मरकर तेरी सासों मे जिंदा हूँ मेरी लाश मेरी लाश नही है
मानस भारद्वाज
आज मेरे पास सब हैं चाँद मेरे आस पास नही है
तेरे बिना खुशियाँ ही नही गम भी अधूरा है
ये कैसा दर्द है की आज तेरे बिना मन भी उदास नही है
मैं दरिया किनारे खडा हो जाता तो सागर मिलने आता था
आज साहिल पे आया हून्तो कोई लहर भी आसपास नही है
मैं बरसों इसी ग़लतफहमी मे जिया हूँ की तेरे लिए ही बना हूँ
अब मरकर तेरी सासों मे जिंदा हूँ मेरी लाश मेरी लाश नही है
मानस भारद्वाज
Monday, May 5, 2008
आज फिर वो पन्ना निकल आया था
आज फिर वह पन्ना निकल आया था
जिसमे पीले गुलाब की वो कली रखी थी
जो किसी ने मांगी थी मैं नही दे पाया था
उस तोहफे को मैं तोड़ लाया था
इसी किताब के उस पन्ने मे मैंने चोरी चोरी छुपाया था
आज उस पन्ने को देखकर आंख भींग जाती है
पर पीले गुलाब की वो कली देखकर
मीठी मीठी याद आती हैं
मैं तो बार बार मर रहा था
इसी पन्ने ने मुझे जीना सिखाया था
इसी कली की तो लेकर प्रेरणा
मैंने जीवन को अपनाया था
आज फिर वो पन्ना निकल आया था
मानस भारद्वाज
जिसमे पीले गुलाब की वो कली रखी थी
जो किसी ने मांगी थी मैं नही दे पाया था
उस तोहफे को मैं तोड़ लाया था
इसी किताब के उस पन्ने मे मैंने चोरी चोरी छुपाया था
आज उस पन्ने को देखकर आंख भींग जाती है
पर पीले गुलाब की वो कली देखकर
मीठी मीठी याद आती हैं
मैं तो बार बार मर रहा था
इसी पन्ने ने मुझे जीना सिखाया था
इसी कली की तो लेकर प्रेरणा
मैंने जीवन को अपनाया था
आज फिर वो पन्ना निकल आया था
मानस भारद्वाज
Friday, April 25, 2008
उसके हुस्न का ये भी जादू था
I WROTE THIS GAZAL LAST NIGHT AND THIS MORNING I FOUND A VERY OLD FRIEND OF MY CHILDHOOD .I DEVOTE IT TO HIM ..................
NILAY ITS FOR YOU ........
उसके हुस्न का ये भी जादू था कि कोई उसे सहने वाले नही मिले
उसके लिए मरने वाले तो बहुत थे पर उसके लिए जीने वाले नही मिले
वह बला कि खूबसूरत थी चाँद को भी मात देती उसकी सूरत थी
पर हमारे बाद कभी उसे हम जैसे दीवाने नही मिले
एक सुखा हुआ फूल ताउम्र अपनी किताब मे रखा हमने
उसके याद आने के कई कारण थे उसे भुलाने के बहाने नही मिले *
तेरे बिना भी हम अपनी सल्तनत के बादशाह थे अपने पर गुरुर न कर
तुझसे मुहब्बत मे सिर्फ़ दर्द ही मिला कोई खजाने नही मिले
मानस भारद्वाज
* ये शेर किसी और शेर से मिलता हुआ मुझे प्रतीत होता हैं । होता क्या हैं कि कई बार कविता लिखते समय हम भाव मे बहते हुए किसी और कि पंक्ति को अपना समझ लेते हैं । पाठकों से निवेदन हैं कि वे धेर्य से काम ले
और अगर उन्हें इसके शायर का नाम पता हैं तो मुझे बताये । मुझे उनका नाम लिखकर एक बोझ अपने ऊपर से उतरता हुआ महसूस होगा ।
NILAY ITS FOR YOU ........
उसके हुस्न का ये भी जादू था कि कोई उसे सहने वाले नही मिले
उसके लिए मरने वाले तो बहुत थे पर उसके लिए जीने वाले नही मिले
वह बला कि खूबसूरत थी चाँद को भी मात देती उसकी सूरत थी
पर हमारे बाद कभी उसे हम जैसे दीवाने नही मिले
एक सुखा हुआ फूल ताउम्र अपनी किताब मे रखा हमने
उसके याद आने के कई कारण थे उसे भुलाने के बहाने नही मिले *
तेरे बिना भी हम अपनी सल्तनत के बादशाह थे अपने पर गुरुर न कर
तुझसे मुहब्बत मे सिर्फ़ दर्द ही मिला कोई खजाने नही मिले
मानस भारद्वाज
* ये शेर किसी और शेर से मिलता हुआ मुझे प्रतीत होता हैं । होता क्या हैं कि कई बार कविता लिखते समय हम भाव मे बहते हुए किसी और कि पंक्ति को अपना समझ लेते हैं । पाठकों से निवेदन हैं कि वे धेर्य से काम ले
और अगर उन्हें इसके शायर का नाम पता हैं तो मुझे बताये । मुझे उनका नाम लिखकर एक बोझ अपने ऊपर से उतरता हुआ महसूस होगा ।
Thursday, April 17, 2008
मन अनुरागी तन बैरागी
मन अनुरागी तन बैरागी ये कोरी दुनियादारी हैं
कुछ उनका भोलापन हैं कुछ सीधे सीधे लाचारी हैं
सीधी राहें पकड़ के चलना सबके बस कि बात नहीं
हमसे पूछो टेडी दुनिया में सीधा चलना कितनी बड़ी फनकारी हैं
आखिर दुनिया तूने हमको फसा ही डाला जाल में अपने
दिल अब उनसे मिलाते हैं जिनसे हाथ मिलाना भी भारी हैं
ख्वाब हमारे उसके वास्ते हैं जिससे कोई रिश्ता नहीं हैं
और जिनसे दुश्मनी होनी थी उनसे हमारी यारी है
---मानस भारद्वाज
ये ग़ज़ल निदा फाजली साहब की ग़ज़ल से प्रेरणा प्राप्त कर लिखी गई हैं ...
कुछ उनका भोलापन हैं कुछ सीधे सीधे लाचारी हैं
सीधी राहें पकड़ के चलना सबके बस कि बात नहीं
हमसे पूछो टेडी दुनिया में सीधा चलना कितनी बड़ी फनकारी हैं
आखिर दुनिया तूने हमको फसा ही डाला जाल में अपने
दिल अब उनसे मिलाते हैं जिनसे हाथ मिलाना भी भारी हैं
ख्वाब हमारे उसके वास्ते हैं जिससे कोई रिश्ता नहीं हैं
और जिनसे दुश्मनी होनी थी उनसे हमारी यारी है
---मानस भारद्वाज
ये ग़ज़ल निदा फाजली साहब की ग़ज़ल से प्रेरणा प्राप्त कर लिखी गई हैं ...
Tuesday, April 8, 2008
कोई भाव नही आते हैं आज
कोई भाव नही आते हैं आज
शब्द सारे ख़त्म हो चुके हैं
ना कोई बैचैनी न कोई दर्द
दिल साला अब खाली - खाली हैं
बस मैं ख़ुद हूँ
ख़ुद मैं समाया हूँ
कोई भाव नही आते हैं आज
तू आ आज रात मुझमे कविता जगा
कोई भाव नही आते हैं आज
-----मानस
शब्द सारे ख़त्म हो चुके हैं
ना कोई बैचैनी न कोई दर्द
दिल साला अब खाली - खाली हैं
बस मैं ख़ुद हूँ
ख़ुद मैं समाया हूँ
कोई भाव नही आते हैं आज
तू आ आज रात मुझमे कविता जगा
कोई भाव नही आते हैं आज
-----मानस
Friday, April 4, 2008
रात चांदनी
रात चांदनी मेरे साथ जली थी
मैंने देखा था सितारों में आग लगी थी
महका - महका धुआ निकला था
रात चाँद पर राख उडी थी
रात चांदनी मेरे साथ जली थी
---मानस
मैंने देखा था सितारों में आग लगी थी
महका - महका धुआ निकला था
रात चाँद पर राख उडी थी
रात चांदनी मेरे साथ जली थी
---मानस
Tuesday, April 1, 2008
अक्सर मेरे साथ ये एहसास चलता हैं
अक्सर मेरे साथ ये एहसास चलता हैं
अक्सर मेरे साथ तू नहीं तेरा साथ चलता हैं
जिस्म रूह खुदा मैं सब भूल जाता हूँ
मेरी दुनिया का हर कतरा तेरे आसपास चलता हैं
मोहब्बत नफरत खुशियाँ गम सब मिट जाते हैं
जब तेरे साथ चलता हूँ खुदा साथ चलता हैं
उदास सा एक किस्सा मेरे आसपास चलता हैं
अक्सर मेरे साथ ये एहसास चलता हैं
अक्सर मेरे साथ तू नहीं तेरा साथ चलता हैं
---मानस
अक्सर मेरे साथ तू नहीं तेरा साथ चलता हैं
जिस्म रूह खुदा मैं सब भूल जाता हूँ
मेरी दुनिया का हर कतरा तेरे आसपास चलता हैं
मोहब्बत नफरत खुशियाँ गम सब मिट जाते हैं
जब तेरे साथ चलता हूँ खुदा साथ चलता हैं
उदास सा एक किस्सा मेरे आसपास चलता हैं
अक्सर मेरे साथ ये एहसास चलता हैं
अक्सर मेरे साथ तू नहीं तेरा साथ चलता हैं
---मानस
मैं रोउंगा तो और रुलाने आयेगा
मैं रोऊंगा तो और रुलाने आएगा
हैं गम बहुत वो आँसू बहाने आयेगा
जिंदगी कि ख्वाइशों का कोई और छोर नहीं
मैं जीना चाहूँगा तो वो मौत के बहाने आएगा
कसक तो बहुत बची हैं दिल में पर
सब भुला दूंगा अगर हाथ मिलाने आएगा
पतझर चल रहा हैं अभी जिंदगी मैं
पर एक दिन वो बनके बहार आएगा
---मानस
हैं गम बहुत वो आँसू बहाने आयेगा
जिंदगी कि ख्वाइशों का कोई और छोर नहीं
मैं जीना चाहूँगा तो वो मौत के बहाने आएगा
कसक तो बहुत बची हैं दिल में पर
सब भुला दूंगा अगर हाथ मिलाने आएगा
पतझर चल रहा हैं अभी जिंदगी मैं
पर एक दिन वो बनके बहार आएगा
---मानस
Sunday, March 30, 2008
अक्सर उसकी तस्वीर मिटा दिया करता हूँ मैं
अक्सर उसकी तस्वीर मिटा दिया करता हूँ मैं
जब चलता हूँ राहों पर
अपनी तक़दीर मिटा दिया करता हूँ मैं
मुझे मालूम हैं हर रास्ता आख़िर में
उसी तक मुड़कर जाता हैं
इसीलिए हाथों कि लकीर
मिटा दिया करता हूँ मैं
उसी को खोजता हूँ मैं हर किसी मैं
उसी को पाता हूँ मैं किसी मैं
तो उसी को खो देता हूँ मैं किसी मैं
मुसलसल ये चलती रहती हैं
जब जब बात बनती हैं
तब तब बिगड़ती रहती हैं
कुछ भी इस जहाँ मंएन ऐसा नही हैं
जिसे पुरा कह सकता हूँ मैं
उसके बिना मैं ख़ुद अधूरा हूँ
उसले बिना हर किसी को
अधुरा कह सकता हूँ मैं
अक्सर उसकी तस्वीर मिटा दिया............
जब चलता हूँ राहों पर
अपनी तक़दीर मिटा दिया करता हूँ मैं
मुझे मालूम हैं हर रास्ता आख़िर में
उसी तक मुड़कर जाता हैं
इसीलिए हाथों कि लकीर
मिटा दिया करता हूँ मैं
उसी को खोजता हूँ मैं हर किसी मैं
उसी को पाता हूँ मैं किसी मैं
तो उसी को खो देता हूँ मैं किसी मैं
मुसलसल ये चलती रहती हैं
जब जब बात बनती हैं
तब तब बिगड़ती रहती हैं
कुछ भी इस जहाँ मंएन ऐसा नही हैं
जिसे पुरा कह सकता हूँ मैं
उसके बिना मैं ख़ुद अधूरा हूँ
उसले बिना हर किसी को
अधुरा कह सकता हूँ मैं
अक्सर उसकी तस्वीर मिटा दिया............
Friday, March 28, 2008
शरारत
फलक से चाँद जब भी मुझे लटके-लटके देखता है
मैं उसे अपनी छत से मुँह बना-बना के कई तरह से चिडाता हूँ
जैसे कोई बच्चा अपने पड़ोस मे रहने वाले बच्चे को चिडाता है
पर फिर तेजी से घर मे भागता हूँ रात भर डरता हूँ घबराता हूँ
पड़ोस मे रहने वाले बच्चे लड़ने झड़ने पर एक दूसरे पर
गेंद कंकड़ पत्थर और ना जाने क्या - क्या फेकते हैं
किसी रात चाँद ने कोई सितारा दे मारा तो
मैं उसे अपनी छत से मुँह बना-बना के कई तरह से चिडाता हूँ
जैसे कोई बच्चा अपने पड़ोस मे रहने वाले बच्चे को चिडाता है
पर फिर तेजी से घर मे भागता हूँ रात भर डरता हूँ घबराता हूँ
पड़ोस मे रहने वाले बच्चे लड़ने झड़ने पर एक दूसरे पर
गेंद कंकड़ पत्थर और ना जाने क्या - क्या फेकते हैं
किसी रात चाँद ने कोई सितारा दे मारा तो
Thursday, March 27, 2008
कभी यू ही सामने आ जाती है रौशनी की तरह
कभी यू ही सामने आ जाती है रौशनी की तरह
अजब सी ये आदतें होती हैं जिंदगी की तरह
बादल मे समा जाता है अक्सर चेहरा उसका
याद आती है उसकी बरसते पानी की तरह
कभी - कभी दोस्तों के साथ हँसी ठिठोली के बीच
उदासी आ जाती है छुट्टियों की दुपहरी की तरह
वो खेलते मे हारती है तो चिड्ती खिजती मारती भी है
वो भी हरकतें करती है कभी-कभी बच्चों की तरह
ये भी अजब बात हुई है मेरे साथ सनम
में भी लिखने लगता हूँ कभी शायरों की तरह
मानस भारद्वाज
अजब सी ये आदतें होती हैं जिंदगी की तरह
बादल मे समा जाता है अक्सर चेहरा उसका
याद आती है उसकी बरसते पानी की तरह
कभी - कभी दोस्तों के साथ हँसी ठिठोली के बीच
उदासी आ जाती है छुट्टियों की दुपहरी की तरह
वो खेलते मे हारती है तो चिड्ती खिजती मारती भी है
वो भी हरकतें करती है कभी-कभी बच्चों की तरह
ये भी अजब बात हुई है मेरे साथ सनम
में भी लिखने लगता हूँ कभी शायरों की तरह
मानस भारद्वाज
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